अमृत काल में वनों पर संकट, विकास के नाम पर हजारों पेड़ों की बली 

दिल्ली में दक्षिणी रिज क्षेत्र में सड़क को चौड़ा करने के नाम पर 1100 वृक्ष काट डाले गए, और हास्यास्पद यह है कि किसी को नहीं पता है कि इसका आदेश किसने दिया है।

फोटो: सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

वर्ष 2014 के बाद से प्रधानमंत्री मोदी एक तरफ तो पर्यावरण पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, जलवायु परिवर्तन नियंत्रित करने में भारत को विश्वगुरु बताते हैं, तो दूसरी तरफ पर्यावरण के हरेक अवयव को विनाश के कगार पर पहुंचा चुके हैं। सत्ता के इस विध्वंसक कारनामे में पर्यावरण और वन मंत्रालय के साथ ही राष्ट्रीय हरित न्यायालय और तमाम दूसरे न्यायालय भी बराबर के भागीदार हैं। लगभग हरेक न्यायालय पर्यावरण विनाश की शिकायत दर्ज करने वाले को ही दण्डित करने की राह है, या फिर पहली सुनवाई में सरकारी पक्ष को मौखिक फटकार लगाकर समाचारों में सुर्खियाँ बटोरने के बाद फैसले में सत्ता का ही साथ देता है।  

हाल में ही प्रधानमंत्री मोदी ने माँ के नाम पर एक वृक्ष लगाने का आह्वान किया था, पर उनके कार्यकाल में जंगल रेगिस्तान बनते जा रहे हैं। वृक्षों को काटने की एक होड़ लगी है, पर्यावरण मंत्रालय आँखें बंद किए बैठा है और एनजीटी में आर्डर-आर्डर किया जा रहा है। कुछ महीने पहले एक अध्ययन में बताया गया था कि पर्यावरण संरक्षण की किसी भी योजना को सामाजिक सरोकारों से नहीं जोड़ना चाहिए, क्योंकि पर्यावरण संरक्षण स्वयं एक सामाजिक सरोकार है। पर हमारे देश की सत्ता हरेक योजना को सामाजिक सरोकार, धर्म और आस्था से जोड़ने में भरोसा करती है - दरअसल सत्ता का सामाजिक सरोकार व्यापक तौर पर सामाजिक ध्रुवीकरण की साजिश है।  


दिल्ली में दक्षिणी रिज क्षेत्र में सड़क को चौड़ा करने के नाम पर 1100 वृक्ष काट डाले गए, और हास्यास्पद यह है कि किसी को नहीं पता है कि इसका आदेश किसने दिया है। दूसरी तरफ वर्ष 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान दिल्ली के वन विभाग ने स्वीकार किया था कि उसने वर्ष 2019 से 2021 के बीच कुल 77420 वृक्षों को काटने की अनुमति दी थी – यानि अनुमति के अनुसार हरेक घंटे औसतन तीन पेड़ कटने थे। यह हमारे देश में पर्यावरण संरक्षण करने वाले संस्थानों के कार्यशैली का एक उदाहरण है।  

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांवड़ यात्रियों को सुविधा देने के नाम पर एक लाख से अधिक वृक्षों को काट डाला गया। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है की आस्था और धर्म का नारा लगाने वाली सरकारें आस्था की दुहाई देकर ही पेड़ काट रही हैं। तमाम पुराने बड़े मंदिरों के भव्य कॉरिडोर भी तो तमाम वृक्षों की बलि देकर ही तो खड़े किये गए हैं। तमाम हवाई अड्डों का विस्तार और बढ़ते राजमार्ग – जिन्हें सत्ता विकास घोषित करती है – वृक्षों की कब्रगाह ही तो हैं। छत्तीसगढ के हसदेव के घने जंगलों में खनन के नाम पर वर्ष 2012 से सरकार के अनुसार लगभग 1 लाख वृक्ष काटे गए हैं, जबकि इसके विरुद्ध आंदोलन कर रहे स्थानीय लोगों के अनुसार यह संख्या साढ़े तीन लाख से भी अधिक है।  

ग्लोबल फारेस्ट वाच के अनुसार वर्ष 2000 से 2023 के बीच भारत में वृक्षों से ढके कुल क्षेत्र में से 23.3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बरिख-विहीन हो गया, जिसमें से 95 प्रतिशत प्राकृतिक वनों के क्षेत्र में ऐसा 2013 से 2023 के बीच हुआ – आंकड़ों से जाहिर है, वृक्षों और वनों की दुश्मन किसकी सत्ता है। वनों का सबसे अधिक विनाश उत्तरपूर्व के राज्यों में है जहां बीजेपी या सहयोगी दलों का वर्चस्व है। फ़ूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाईजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार वनों के विनाश के सन्दर्भ में भारत का दुनिया में ब्राज़ील के बाद दूसरा स्थान है। वर्ष 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 15 वर्षों के दौरान सरकारी तौर पर 3 लाख से अधिक वन क्षेत्र को गैर-वन क्षत्र घोषित कर दिया गया है। 

कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के शोध छात्र विजय रमेश ने हमारे देश के वन क्षेत्र को गैर-वन उपयोग में परिवर्तित करने का गहन विश्लेषण किया है, और इनके अनुसार सरकार तेजी से वन क्षेत्रों में खनन, उद्योग, हाइड्रोपॉवर और इन्फ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने की अनुमति दे रही है, जिससे वनों का उपयोग बदल रहा है और इनका विनाश भी किया जा रहा है। वर्ष 2014 से 2020 के बीच पर्यावरण और वन मंत्रालय में वन स्वीकृति के लिए जितनी भी योजनाओं ने आवेदन किया, लगभग सबको (99.3 प्रतिशत) स्वीकृति दे दी गई, जबकि इससे पहले के वर्षों में परियोजनाओं के स्वीकृति की दर 84.6 प्रतिशत थी। यही नहीं, बीजेपी की सरकार वनों के साथ कैसा सलूक कर रही है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यह है कि 1980 में लागू किये गए वन संरक्षण क़ानून के बाद से वर्ष 2013 तक, जितने वन क्षेत्र को गैर-वन उपयोगों के लिए खोला गया है, इसका 68 प्रतिशत से अधिक वर्ष 2014 से वर्ष 2020 के बीच स्वीकृत किया गया। वर्ष 1980 से 2013 तक कुल 21632.5 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को गैर-वन उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था, पर इसके बाद के 6 वर्षों के दौरान ही 14822.47 वर्ग किलोमीटर के वन क्षेत्र को गैर-वन गतिविधियों के हवाले कर दिया गया। 


वैसे, जो लोग इस समय केंद्र में काबिज सरकार के कामकाज और विचारधारा को जानते हैं, उन्हें इन आंकड़ों पर कोई आश्चर्य नहीं होगा. हमारे प्रधानमंत्री जिस भी क्षेत्र की लगातार और बार-बार चर्चा करते हैं, वहां हमेशा सरकारी संकट पैदा किया जाता है। प्रधानमंत्री जी चीन की बातें करते हैं, दलवान घाटी का किस्सा सबने देख लिया, प्रधानमंत्री जी 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की बातें करते हैं और अर्थव्यवस्था की हालत सभी जानते हैं, इसी तरह प्रधानमंत्री जी पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ भारत और ग्रीन इकॉनमी की भी बार बार बातें करते हैं, और हमारा पर्यावरण लगातार पहले से अधिक बिगड़ता जाता है, उद्योगपतियों को पर्यावरण के दोहन की अधिक छूट मिलती जा रही है।  

स्टेट ऑफ़ इंडियाज फारेस्ट रिपोर्ट के अनुसार देश के कुल भू-भाग में से 21.67 प्रतिशत पर वन हैं। इस वन क्षेत्र में फलों के बाग़, सड़क और नहर किनारे के पेड़, औद्योगिक खेती और बृक्षरोपण का क्षेत्र भी सम्मिलित है। यह पूरा क्षेत्र 712249 वर्ग किलोमीटर है, इस रिपोर्ट के अनुसार मध्यम सघन वन का क्षेत्र कम हो रहा है और पिछले दस वर्षों के भीतर इसमें 3.8 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जो चिंताजनक है। 

पर्यावरण और वन मंत्रालय अपनी स्थापना के बाद से किसी भी दौर में पर्यावरण का संरक्षक नहीं रहा है, पर अब तो पूरी तरह से विनाषक की भूमिका निभा रहा है। अब यह पर्यावरण की चिंता नहीं करता बल्कि अपने आदरणीय की चिंता करता है और ऊपर से आये आदेशों का पालन करता है, और पर्यावरण विनाश को भी कुतर्क के सहारे उचित ठहराता है। आज के दौर में पर्यावरण को बचाने की मुहीम चलाने वाले सरकार की नज़रों में देशद्रोही, अर्बन नक्सल और विकास विरोधी लोग हैं। वन क्षेत्रों में सदियों से रहने वाली आबादी और जनजातियाँ जब इसके विनाश को रोकने के सरकारी कदमों का विरोध करती हैं तब उन्हें नक्सल करार दिया जाता है। 

सीएजी समय-समय पर अपनी रिपोर्टों में पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा परियोजनाओं को स्वीकृत किये जाने वाले पर्यावरण स्वीकृति और वन स्वीकृति में किये जाने वाले घपलों की चर्चा करता है, पर स्थितियां और बिगड़ती जा रहीं हैं। इस सरकार के दौर में पर्यावरण पूरी तरह से उद्योगपतियों की धरोहर बन गया है, उनके हवाले हवा, पानी, जंगल और वन्य जीव कर दिए गए हैं, और जनता के लिए जहरीली गैसें और प्रदूषण की मार है। वैसे भी देश में आंकड़ों का कॉपीराइट प्रधानमंत्री के पास है, और उनके हरेक वक्तव्य में जंगलों का क्षेत्र बढ़ जाता है भले ही उपग्रह की तस्वीरों में वनों का विनाश नजर आ रहा हो। यही देश का अमृत काल है। 

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