केंद्र सरकार ऐसा कानून बना रही है जिसमें जन्म और मृत्यु के लिए आधार अनिवार्य कर दिया जाएगा। यदि विधेयक कानून बन जाता है, तो इसे राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा। इस तरह राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर – एनपीआर का मुद्दा फिर से जिंदा हो जाएगा। पिछली बार जब सरकार ने एनपीआर बनाने की कोशिश की थी तो देश भर में 2019-20 में हुए सीएए-एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शनों के कारण इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था।
अप्रैल 2020 में केंद्र सरकार एनपीआर (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) का काम शुरु करने वाली थी। इसके लिए बड़ी टीम चाहिए थी, जिसमें सरकारी कर्मचारी, अध्यापक-शिक्षक और लिपिकीय स्टाफ को घर-घर जाकर देश के 25 करोड़ घरों में सर्वे करना था और लोगों से सवाल पूछकर उन्हें अंकित करना था।
लेकिन, इस कोशिश को लगातार जारी विरोध प्रदर्शनों के चलते रोक दिया गया था। ये प्रदर्शन जारी रहे थे क्योंकि प्रधानमंत्री ने कोई आश्वासन नहीं दिया था कि एनआरसी को लागू नहीं किया जाएगा। उन्होंने सिर्फ इतना भर कहा था कि इस पर अभी कोई चर्चा नहीं हुई है। इससे लोगों में यह भरोसा नहीं जगा कि असम में जो कुछ हुआ है, वह देश भर में नहीं दोहराया जाएगा। यानी लोगों को संदिग्धों की सूची में डाल दिया जाएगा, उनके मताधिकार छीन लिए जाएंगे और एनआरसी की प्रक्रिया शुरु कर एक विदेश प्राधिकरण बना दिया जाएगा और अंतत: लोगों को डिटेंशन सेंटर यानी बंदी केंद्रों में भेज दिया जाएगा।
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इन विरोध प्रदर्शनों के अलावा एक बात और थी, वह यह कि एनपीआर-एनआरसी का गैर बीजेपी शासित राज्यों ने भी विरोध किया था। कुछ राज्यों ने कहा था कि वे अपने यहां एनपीआर लागू नहीं करेंगे। केरल सरकार ने तो केंद्र को सूचित किया था कि अगर वहां इसे लागू किया गया तो कानून-व्यवस्था का संकट पैदा हो जाएगा। राज्य सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी थी। उस समय मध्य प्रदेश कांग्रेस द्वारा शासित था और उसने भी कहा था कि इसे राज्य में लागू नहीं किया जाएगा।
पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने लोगों का आह्वान किया था कि वे ऐसा सर्वे करने आने वाले कर्मचारियों का विरोध करें और कोई कागज न दिखाएं। वहीं कुछ राज्यों (ओडिशा और बिहार) ने कहा था कि वे अपने यहां आंशिक तौर पर एनपीआर लागू करेंगे। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा था कि वे राजस्थानियों मको जेल में भेजने के बजाए खुद जेल जाना चुनेंगे। संघीय स्तर पर ऐसा स्पष्ट हो गया था कि इस सिलसिले में जमा किए गए आंकड़े आधे-अधूरे होंगे। यह तीसरा कारण था जिसके चलते मोदी सरकार ने एनपीआर-एनआरसी की प्रक्रिया पर 2020 में रोक लगा दी थी।
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लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इस प्रक्रिया को रोकने का मुख्य कारण था कि इसके लिए भौतिक स्तर पर आंकड़ों को जुटाना, यानी घर-घर जाकर आंकड़े जमा करना। नागरिकता कानून से पैदा ध्रुवीकरण के चलते सरकार ने कुछ कड़ी कार्रवाइयां भी कीं और इन्हें प्रचारित भी किया गया। फरवरी 2020 में हैदराबाद में आधार की देखरेख करने वाले अधिकारियों ने अपने कार्यक्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की और करीब 100 लोगों को दफ्तर बुलाकर इस बात का सबूत मांगा कि वे भारतीय नागरिक हैं। जाहिर हैं, इनमें सभी मुस्लिम नागरिक थे।
जब इसकी खबरें सामने आईं तो आधार अधिकारियों ने सफाई पेश की कि कुछ गलतफहमी थी और फिर इससे अपने हाथ खींच लिए। लेकिन नुकसान तो हो चुका था। उधर असम में एक अदालत ने एक मुस्लिम महिला के भारतीय नागरिकता के दावे को खारिज करने के लिए 1960 के दशक के मतदाता पहचान पत्र और भूमि राजस्व रिकॉर्ड सहित 15 अलग-अलग दस्तावेजों को खारिज कर दिया। इसे फिर खूब प्रचारित किया गया। बीदर में एक स्कूल में नागरिकता कानूनों आधारित पर एक नाटक करने को लेकर बच्चों से पूछताछ की गई, उनके माता-पिता पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया और महिलाओं को जेल में डाल दिया गया। इस घटना के खिलाफ वैश्विक स्तर पर आक्रोश व्यक्त किया गया।
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इन सबके परिणामस्वरूप, देश के बड़े हिस्से में एनपीआर और सीएए के खिलाफ जानकारियां सामने आईं और बड़े पैमाने पर लामबंदी हुई। अकेले तमिलनाडु में एक ही दिन में चेन्नई, तिरुनेलवेली, वेल्लोर, कोयंबटूर, थूथुकुडी, तिरुचि, मदुरै, सलेम और कृष्णागिरी में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। ये ऐसे विरोध प्रदर्शन थे जिन्हें रोकने के लिए कई शहरों में पूरे पुलिस बल की तैनाती की आवश्यकता थी। लेकिन भारत जैसे बड़े देश में यह तरीका कारगर नहीं है।
सीएए के खिलाफ प्रदर्शनों के चलते नेशनल सैंपल सर्वे भी प्रभावित हुआ था। यह सर्वे जनसंख्या से जुड़े आंकड़े जमा करता है। इस कारण जनगणना और हर पांच साल में होने वाला सर्वे भी अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था।
देश के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रणब सेन ने उस समय कहा था कि यह अपने आप में नए किस्म की समस्या है। उन्होंने कहा था कि, “एनएसएस सर्वे करने वालों पर हमले होना नई बात नहीं है। पहले भी ऐसा हुआ है, खासतौर से तब जब लोगों से उनकी संपत्ति या आमदनी के बारे में पूछा जाता था, लेकिन यह बहुत आम नहीं था क्योंकि धीरे-धीरे लोग इस बात के आदी हो गए थे कि एनएसएस सर्वे में ऐसा पूछा जाता है।”
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ये सब अब बदल चुका था। उन्होंने कहा था कि दरअसल हम, “ऐसी स्थिति में हैं कि जहां जनगणना सही तरीके से हो ही नहीं सकती, और अगर जनगणना ठीक से नहीं होगी, तो अगले दस साल में होने वाले किसी भी घर-घर जाकर किए जाने वाले सर्वे के आंकड़े भरोसे लायक नहीं होंगे। अगर इसे (जनगणना) लेकर समस्या आ गई तो खतरा इस बात का है कि अगले 11 साल तक हम समस्याओं से जूझेंगे।”
“आधार को जन्म और मृत्यु से लिंक करने से नागरिकता को लेकर फिर बहस शुरु हो जाएगा, जोकि दुर्भाग्यपूर्ण होगा। हमने इस बात को ध्यान में नहीं रखा है कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव, यूरोपीय यूनियन और अमेरिकी कांग्रेस समेत दुनिया भर की शक्तिशाली आवाज़ों ने 2020 के दौरान भारत में जो कुछ हो रहा था उस पर चिंता जाहिर की थी।”
इन परिस्थितियों में सरकार के लिए एनपीआर प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है, चाहे वह किसी भी तरीके से हो। उम्मीद है कि इस सब पर विचार किया गया है क्योंकि हम फिर से नागरिकता पर विवाद की ओर बढ़ रहे हैं।
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