कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार ने राज्य विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य की राजनीति में अहम माने जाने वाले लिंगायत समुदाय को एक अलग धर्म के तौर पर मान्यता देने की सिफारिश को मंजूरी दे दी है। राज्य सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास भेज दिया है। जिसके बाद गेंद अब केंद्र की बीजेपी सरकार के पाले में चली गई है। ऐन चुनाव से पहले ये फैसला लेकर सिद्धारमैया सरकार ने विपक्षी दल बीजेपी को बड़ा झटका दे दिया है। लिंगायत समुदाय के प्रतिनिधियों ने 18 मार्च को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से मिलकर समिति की सिफारिशों को लागू करने की मांग की थी, जिसे सरकार ने 19 मार्च को स्वीकार कर लिया। हालांकि, राज्य सरकार के इस फैसले के बाद कर्नाटक के कालाबुर्गी में लिंगायत और वीरशैव समुदाय के लोगों के बीच झड़प की खबर है।
लिंगायत समुदाय वर्षों से हिंदू धर्म से अलग अपनी पहचान को मान्यता देने की मांग करता आ रहा है। समुदाय की मांगों पर विचार के लिए राज्य सरकार ने नागमोहन दास समिति गठित की थी, जिसने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी। जिसके बाद सोमवार को राज्य कैबिनेट ने समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए इस प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति के लिए केंद्र के पास भेज दिया।
गौरतलब है कि राज्य की कांग्रेस सरकार ने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने का फैसला ऐसे समय किया है, जब विधानसभा चुनाव में मुश्किल से एक महीने का समय बचा है।कर्नाटक में इस समुदाय की आबादी करीब 17 फीसदी है। जिसका विधानसभा की तकरीबन 100 सीटों पर प्रभाव माना जाता है। दशकों से ये समुदाय परंपरागत रूप से बीजेपी का समर्थक रहा है। हालांकि, इस समुदाय को राज्य में फिलहाल ओबीसी का दर्जा मिला हुआ है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा समेत कई बड़े नेता इसी समुदाय से आते हैं।
लेकिन दिलचस्प बात ये है कि बीजेपी लिंगायत समुदाय को हिंदू धर्म से अलग करने की मांग का विरोध करती रही है। इसी समुदाय से आने वाले येदियुरप्पा कांग्रेस पर लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देकर समुदाय में फूट डालने की कोशिश करने का आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन 10 साल पहले जब पहली बार कर्नाटक में बीजेपी को कामयाबी मिली थी, तो उसे सत्ता में पहुंचाने में इसी समुदाय की अहम भूमिका रही थी।
हालांकि किसी समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास है। राज्य सरकारें इसके लिए केवल अपनी अनुशंसा केंद्र को भेज सकती हैं। लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा मिलने के बाद इसे मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25-28) के तहत अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा भी मिल सकता है। जिससे लिंगायत समुदाय अपने शिक्षण संस्थान भी खोल सकते हैं। वर्तमान में भारत में मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी और जैन धर्मों को अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा हासिल है।
कौन हैं लिंगायत
यह समुदाय राजनीतिक तौर पर इतनी अहमियत क्यों रखता है और इसका इतिहास क्या है? 12वीं सदी में भक्ति काल के दौरान समाज सुधारक बासवन्ना ने हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। उन्होंने वेदों को खारिज कर मूर्तिपूजा का भी विरोध किया था। बासवन्ना ने शिव के उपासकों को संगठित कर ‘वीरशैव’ संप्रदाय की स्थापना की थी। आमतौर पर मान्यता यही है कि वीरशैव और लिंगायत एक ही होते हैं। हालांकि लिंगायतों का मानना है कि वीरशैव संप्रदाय के लोगों का अस्तित्व समाज सुधारक बासवन्ना के उदय से भी पहले से है।
Published: 19 Mar 2018, 7:43 PM IST
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Published: 19 Mar 2018, 7:43 PM IST