न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सुनिश्चित करने के लिए जब हरियाणा और पंजाब के किसान आंदोलन कर रहे हैं, उसी बीच तीन वीडियो क्लिप्स वायरल हो रहे हैं। इसमें से एक में करीब पांच साल के तीन बच्चे घर की छत पर ‘आंदोलन-आंदोलन’ खेल रहे हैं और वे हवा में हाथ उछाल-उछालकर नारे लगा रहे हैं: किसान यूनियन जिंदाबाद और मोदी सरकार मुर्दाबाद। दो अन्य क्लिप्स में ब्रिटेन और कनाडा में रह रहे पंजाब के प्रवासी भारतीय यहां के किसानों के हक में प्रदर्शन करते दिख रहे हैं। इनमें जीन्स और सूट पहने एसयूवी में सवार पंजाबी झंडे लगाए हैं और नारे लगा रहे हैं। उनका कहना है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने कृषि उत्पादों के व्यापार को निजी कंपनियों के हाथों में सौंपने के लिए संसद के जरिये कानून ‘जबरन’ पास कर लिए हैं। ब्रिटेन के क्लिप में पंजाबी गाने बजते साफ सुनाई दे रहे हैं जिनमें कहा गया हैः दिल्ली सरकार, अगर काई हमारे खेतों पर अधिकार करता है, तो हम अपना सबकुछ नष्ट कर देंगे; अगर किसानों के साथ गलत होगा तो खेती-किसानी में उपयोग किए जाने वाले हाथ हथियार थाम लेंगे।’
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सचमुच, किसान कितने गुस्से में हैं, इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है। पंजाब की 31 किसान यूनियन के नेताओं को 8 अक्टूबर को दिल्ली में केंद्रीय कृषि सचिव से मिलने का न्योता दिया गया था। पर एक दिन पहले ही इनमें से 30 ने कह दिया कि वे किसी नौकरशाह से नहीं मिलना चाहते। उनका साफ कहना था कि इस तरह की बातचीत से कुछ खास होना-जाना नहीं है क्योंकि कोई भी नौकरशाह सिर्फ उनकी बातें सुनेगा और यह आश्वासन ही दे पाएगा कि वह उन लोगों की बातें प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिमंडल तक पहुंचा देगा। इन यूनियनों का कहना है कि हमारी बातचीत प्रधानमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री से हानी चाहिए जिन्होंने किसानों को विश्वास में लिए बिना ही ऐसा कानून पारित करवा दिया है। एक किसान ने गुस्से में कहा भी, ‘इन लोगों ने हम लोगों की बात सुने बिना ही कानून भी बनवा दिए और अब वे चाहते हैं कि हम किसी अफसर से बातचीत करें।’
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दरअसल, किसान ठोस चीजें चाहते हैं। उनका कहना है कि सरकार अगर इतनी ही मुतमइन है कि किसानों को निजी व्यापरियों से ज्यादा कीमतें मिलेंगी, तो वह यह सुनिश्चित करने वाली अधिसूचना क्यों नहीं लाती कि देशमें कहीं भी कोई भी कृषि उत्पाद एमएसपी से कम दर पर नहीं खरीदी-बेची जाएगी। वे साफ कहते हैं कि सरकार ने अभी जून में कृषि को लेकर तीन अध्यादेश लागू किए और बाद में सितंबर में संसद के जरिये इन्हें कानून बनवा दिए लेकिन इसी अवधि के दौरान थोक मंडी में कीमतें एमएसपी से नीचे चली गईं।
मोरिंडा के किसान अमर सिंह कहते हैं कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) मुख्यतः दो फसलें- गेहूं और धान, की खरीद करता है। सिर्फ 25 प्रतिशत फसल की ही खरीद एमएसपी पर हो पाई है जबकि शेष 75 फीसदी कम कीमतों पर बिकी है। एक तो सरकार खरीद और ऊपर से एमएसपी भी गई, तो रिलायंस या अडानी ग्रुप-जैसे बड़े कॉरपारेट द्वारा तय की जाने वाली मनमानी कीमतों के सामने कौन टिक पाएगा।
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यमुनानगर के किसान सौदागर सिंह इसे ही दूसरे शब्दों में कहते हैं: ‘कॉरपोरेट समूह ऐसे करारों के साथ आएंगे जो जटिल होंगे और ऐसी छुपी शर्तें होंगी जिन्हें समझना किसानों के लिए मुश्किल ही होगा। साफ बात है कि वे अपना फायदा देखेंगे या किसानों का?’ इस तरह का अविश्वास कितना गहरा है, इसे मोरिंडा के किसान अमर सिंह की बातों से समझा जा सकता हैः ‘करार पर हस्ताक्षर के बाद कंपनियां किसानों को परेशान करेंगी। चूंकि कानून में कोई नियामक कार्यविधि नहीं है और जो है भी, वे इतनी जटिल हैं कि अंततः फायदा कंपनियां को ही है, तो मारा तो किसान ही जाएगा।’
इस प्रकार की चिंताओं की वजह भी है। नए कानूनों से यह तो साफ है कि बाजार से सरकार अपना नियंत्रण हटा रही है। इससे यह आशंका स्वाभाविक है कि मंडियां और सरकारी खरीद केंद्र खत्म हो जाएंगे। संगरूर के किसान नेता रघुनाथ सिंह नवजीवन से कहते हैं कि मंडियों से प्रत्यक्ष-परोक्ष तौर पर जुड़े लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे और इसमें सरकारी तथा गैर-सरकारी- दोनों किस्मों के लोग होंगे। गुरदासपुर के बिशंभर दास कहते हैं कि नए कानूनों से परंपरागत अढ़तिया व्यवस्था चरमरा जाएगी। सरकार कह रही है कि बीच के दलालों को खत्म कर रही है। लेकिन ये खत्म नहीं होंगे, नए किस्म के दलाल पनप जाएंगे। पटियाला के सरबजीत सिंह लेहरा को आशंका है कि नए कानून छोटी जोत वाले छोटे किसानों को बर्बाद कर देंगे। वह कहते हैं कि ‘आखिर, छोटा किसान अपने फसल को स्टोर कैसे रख सकेगा? उसके पास तो स्टोरेज की सुविधा है नहीं। तो वह अपनी फसल निजी खरीदारों के हाथों उनके द्वारा तय कीमतों पर औने-पौने बेचने को बाध्य होगा।’
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इन्हीं स्थितियों की वजह से पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह कह रहे हैं कि किसान- विरोधी कानूनों ने इस सीमावर्ती राज्य में ‘गहरा असंतोष और प्रतिरोध’ पैदा कर दिया है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा भी इसी कारण सलाह दे रहे हैं कि ‘केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एमएसपी से कम कीमत पर कोई भी उत्पाद नहीं खरीदा जा सकेगा।’ इसके लिए वह सरकार को अलग से एक अध्यादेश लाने का सुझाव दे रहे हैं जिसमें यह प्रावधान हो किअगर एमएसपी से कम कीमत पर कोई कंपनी किसी किसान से कोई अनाज खरीदता है, तो उस पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
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