तीन साल पूरे होने पर योगी आदित्यनाथ सरकार ने कामकाज के दावे तो बहुत किए, पर वास्तव में क्या हो रहा है, यह सबके सामने है।
योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के एक साल पूरा होने से पहले ही 2018 में लखनऊ में 21 फरवरी से दो दिवसीय इन्वेस्टर्स समिट किया। मुख्यमंत्री का दावा है कि इसमें सवा चार लाख करोड़ रुपये के एमओयू मंजूर हुए हैं। लेकिन इनमें से 5 फीसदी भी जमीन पर नहीं उतर सके। इन दावों के उलट जमीन पर वे उद्योग ही लगे हैं जो पहले से पाइप लाइन में थे। गोरखपुर और आसपास के जिलों में करीब 5,000 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव आए थे लेकिन जमीन न मिलने के कारण 95 फीसदी प्रस्ताव हवा में हैं। होटल कारोबार से जुड़े पवन बथवाल कहते हैं कि जमीन नहीं मिलने से प्रस्ताव पर अमल नहीं हो पा रहा है। गोरखपुर के साथ ही वाराणसी और प्रयागराज में फाइव स्टार होटल खोलने के प्रस्ताव हैं, पर काम कहीं नहीं दिख रहा। निवेश प्रस्तावों पर भले ही अमल नहीं हो रहा हो, सरकार ने यूपी इन्वेस्टर्स समिट के नाम पर 65 करोड से अधिक फूंक दिए।
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इससे संतोष नहीं हुआ, तो रक्षा उत्पादों को लेकर अभी इसी साल लखनऊ में 5 फरवरी से तीन दिवसीय डिफेंस एक्सपो हुआ। इसमें भी 3,000 विदेशी और 10,000 से अधिक देसी प्रतिनिधियों के बीच 103 निवेश प्रस्तावों को लेकर एमओयू हुआ। योगी का दावा है कि फरवरी, 2018 में लखनऊ में हुई निवेशक सम्मेलन के बाद सूबे में निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में कुल 2.75 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश हुआ है। सरकार अब ‘ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट’ (वैश्विक निवेशक सम्मेलन) की तैयारी में है। दावा है कि वर्ष 2024 में प्रदेश की अर्थव्यवस्था एक हजार अरब डॉलर की हो जाएगी।
लेकिन लगता यही है कि सरकार निवेश और निवेश प्रस्तावों में अंतर नहीं कर रही है और यह सब सिर्फ सपने देखने-दिखाने जैसा ही है। तब ही तो कांग्रेस के प्रदेश महासचिव विश्वविजय सिंह कहते हैं कि मुख्यमंत्री सिर्फ मार्केटिंग में विश्वास करते हैं।
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इन सबके बाद भी घोटालों में कमी नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर सीधे तौर पर भले ही भ्रष्टाचार के आरोप न लगे हों लेकिन उनकी सरकार घोटालों के आरोपों से घिरी हुई है और मंत्री ही इन्हें लेकर आपस में आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे। संभवतः इसी वजह से स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह, श्रीकांत शर्मा से लेकर लोक निर्माण मंत्री केशव प्रसाद मौर्या से योगी की अनबन की खबरें आती रहती हैं। मुख्यमंत्री पीडब्ल्यूडी के कार्यों को लेकर जांच के आदेश देते हैं तो डिप्टी सीएम केशव प्रसाद लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) में हुए घोटाले की जांच को लेकर पत्र लिखते नजर आते हैं। इनमें एलडीए में कामर्शियल प्लॉटों के आवंटन से लेकर शान-ए- अवध होटल को बेचे जाने, अपार्टमेंट के निर्माण में घपले, समायोजन में फर्जीवाड़े, पुरानी योजनाओं की गायब हुई फाइलें और करीबियों को फायदा पहुंचाए जाने-जैसे कई मामले शामिल हैं।
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एलडीए के अधिकारियों ने 9 दिन पुरानी कंपनी को भी प्लॉट आवंटित कर दिए जबकि नियमों के अनुसार एलडीए के कमर्शियल प्लॉटों की नीलामी में केवल तीन साल पुरानी कंपनियों को ही शामिल करने का प्रावधान है। एलडीए द्वारा अपार्टमेंट बनाने में धांधली करने वाली कंपनियों को ब्लैक लिस्ट नहीं किया गया बल्कि बचा हुआ काम दूसरी कंपनियों से करवा लिया गया। सरकार की पुरानी योजनाओं में एलडीए ने चहेतों को सबसे पहले 40 वर्ग मीटर के प्लॉट आवंटित किए और बाद में उसकी जगह उन्हें गोमतीनगर विस्तार जैसी पॉश कॉलोनियों में 150 वर्ग मीटर के प्लॉट दे दिए। लखनऊ में टीपी नगर, गोमतीनगर और जानकीपुरम समेत कई योजनाओं में सैकड़ों आवंटियों की फाइलें ही गायब हो गई हैं। यहां तक कि रजिस्टर में भी कोई ब्योरा दर्ज नहीं किया गया है और न ही कोई कोई रिकॉर्ड रखा गया है।
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यूपी की सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री ने सड़कों को गड्ढा मुक्त करने का ऐलान किया था। बांदा से बीजेपी सांसद भैरों प्रसाद मिश्रा ही इस अभियान की कलई खोल चुके हैं। सांसद ने बांदा और चित्रकूट में सड़कों के गड्ढा मुक्ति के नाम पर हुए घोटाले को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। पूरे प्रदेश में गड्ढामुक्त अभियान को लेकर करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितता हुई है। विभागीय अफसरों ने सड़कों पर नाम मात्र का लेपन कराया। फिर फर्जी ठेकेदारों के जरिये भुगतान दिखाया जा रहा।
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